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यूपी में भाजपा को भारी पड़ी दलितों की नाराज़गी

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उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। शर्मनाक हार इसलिए क्योंकि उपचुनाव में मतदान से एक दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बागपत में रैली को सम्बोधित किया, बावजूद इसके भाजपा अपनी सीटें बचाने में नाकाम रही।

उपचुनाव में मिली हार के बाद पार्टी नेताओं के हार को लेकर तरह-तरह के बयान आने के साथ ही पार्टी के अनुसूचित मोर्चा ने पदाधिकारियों के मनोनयन की सूची जारी की। पार्टी की इस कवायद के बाद प्रदेश के राजनैतिक गलियारे में इस बात की चर्चा तेज हो गयी कि क्या भाजपा को दलितों की नाराजगी भारी पड़ी।
प्रदेश में यह कोई पहला उपचुनाव नहीं है, जिसमें पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री के संसदीय क्षेत्रों गोरखपुर और फूलपुर में हुए चुनाव में भी पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट भाजपा सांसद हुकूम सिंह के निधन से रिक्त हुई थी। स्वर्गीय हुकूम सिंह के कैराना से पलायन का मुद्दा उठाने के बाद प्रदेश की राजनीति में एकाएक गर्माहट लाकर अपनी धु्रवीकरण की राजनीति को धार दी और पहली बार प्रदेश में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

प्रदेश में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के कुछ दिनों बाद ही सहारनपुर में महाराणा प्रताप की जयंती पर निकली शोभायात्रा के दौरान भीषण ठाकुर-दलित संघर्ष हुआ, जिसमें पहली बार भीम आर्मी चर्चा में आयी। सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड के बाद दलितों में भाजपा को लेकर पनपा प्रेम कम होना शुरू हो गया, जो समय-समय पर दलित उत्पीडऩ के साथ दलितों की भाजपा से दूरी का सबब बना। देश के अलग-अलग राज्यों सहित प्रदेश के कई जनपदों में दलितों के साथ हो रहे उत्पीडऩ की खबरों ने दलितों में भाजपा के प्रति उत्पन्न असंतोष को हवा देने का काम किया।

कैराना लोकसभा क्षेत्र में करीब 17 लाख मतदाता हैं, जिनमें 3 लाख मुस्लिम, 4 लाख पिछड़े और लगभग डेढ़ लाख दलित मतदाता हैं। यहां मुस्लिम और दलित मतदाता खास मायने रखते हैं और हार-जीत तय करते हैं। भाजपा के लिए कैराना लोकसभा के महत्व को यूं समझा जा सकता है कि यहां पार्टी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्रियों डॉ. दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य की ताबड़तोड़ कई रैलियां करायी। यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कैराना से महज 40 किलोमीटर दूर रैली को सम्बोधित किया, बावजूद भाजपा अपनी प्रतिष्ठïा बचाने में नाकाम रही।

उपचुनाव की मतगणना शुरू होने के साथ ही जिस तरह विपक्षी प्रत्याशियों कैराना से तबस्सुम हसन और नूरपुर से नईमुल हसन की बढ़त की खबरें आना शुरू हुई, भाजपा नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें आने लगी। दोपहर होते-होते भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के पदाधिकारियों की सूची जारी हो गयी। उपचुनाव में मिली हार के बाद मोर्चा की सूची जारी होने के बाद प्रदेश के राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा तैरने लगी कि क्या भाजपा को उपचुनाव में मिली हार दलितों की नाराजगी की वजह तो नहीं।

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