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क्या चुनावी घोषणा पत्र (Election Manifesto) की कोई कानूनी बाध्यता है?

लोकसभा चुनाव सर पर हैं जहाँ एक तरफ नेता अपने भाषणों में व्यस्त हैं वहीं हर राजीनीतिक पार्टी की एक टीम चुनावी मैनिफेस्टो यानि घोषणा पत्र को अमित रूप देने में व्यस्त है। लेकिन सवाल यह है की क्या चुनावी घोषणा पत्र का कोई कानूनी अस्तित्व है।

पहली नज़र में लोग यही कहेंगे की अगर लिखा हुआ है तो कानूनी अस्तित्व तो होगा ही लेकिन ऐसा नहीं है। घोषणापत्र में किये गए वादों को अगर सत्ता में आने के बाद राजनीतिक पार्टियां पूरा नहीं भी करती हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करना मुश्किल है। इसका फैसला सिर्फ और सिर्फ जनता की अदालत में मुमकिन है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में Sep 29, 2015 को छपी खबर के अनुसार अधिवक्ता मिथिलेश कुमार पांडेय ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की थी और मांग की थी के राजनीतिक पार्टियों द्वारा जारी किये गए घोषणापत्र को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।

इसपर सुनवाई करते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्ता और न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की पीठ ने अधिवक्ता मिथिलेश कुमार पांडेय की जनहित याचिका को करने सुनने से इनकार करते हुए कहा था क्या कानून में कोई प्रावधान है जो घोषणा पत्र में किए गए वादे एक राजनीतिक पार्टी के खिलाफ लागू करने योग्य बनाता है?”

इस मामले को लोगों की अदालत पर छोड़ते हुए, पीठ ने कहा कि न्यायपालिका राजनीतिक प्रणाली में हर समस्या का इलाज नहीं कर सकती है।

पांडे ने तर्क दिया था कि अदालत को राजनीतिक दलों द्वारा किए गए झूठे और गैरकानूनी वादों को रोकने के लिए घोषणापत्र तैयार करने के लिए दिशा निर्देश देना चाहिए, जिसमें अवैध कॉलोनियों को नियमित करना भी शामिल है।

इसके बाद कई बार राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र को कानून के दायरे में लाये जाने के लिए कई नेताओं और सामाजिक संस्थानों ने कोशिश तो की लेकिन इसका हल नहीं निकल सका।

साल 2018 में भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गाँधी ने भी हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख लिखा था और यह वकालत की थी कि राजनीतिक पार्टियों को उनके चुनावी मैनिफेस्टो के प्रति जवाबदेह बनाया जाए।

उन्होंने अपने लेख में कहा था कि 2014 के आम चुनावों के लिए चुनाव आयोग (ECI) ने आदर्श आचार संहिता (मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट) तैयार किया गया था जिसमें कहा गया था कि पार्टियों को अपने घोषणापत्रों में ऐसे वादे करने से मना किया गया था जो मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव डालें। हालाँकि, बहुत तथ्य यह है कि MCC कानून द्वारा लागू करने योग्य नहीं है, जिसके चलते इस तरह के दिशानिर्देशों का पालन मुश्किल हो जाता है।

वरुण गाँधी ने यह भी लिखा था कि यह ज़रूरी है कि राजनीतिक दलों के लिए उनके वादों को पूरा करने के लिए कानूनी जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए ताकि वह अपने वादों के प्रति जवाबदेह बनें। साल 2013 में संसद की कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति ने सिफारिश की कि MCC को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए और जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 का एक हिस्सा बनाया जाए, इस तरह के सुधार से चुनाव आयोग और सशक्त हो जाएगा, जो राजनीतिक दलों को घोषणापत्रों में खोखले वादे करने से रोक सकता है।

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